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“हरित उपवन सोरखा” पर्यावरण, जल संवर्धन व जैव विविधता की अदभुत मिसाल के रूप में उभरा

 


सरकार गिव मी ट्रीज ट्रस्ट और एचसीएल के प्रयास से हुआ यह कार्य


एक गावं ऐसा भी 

सरकार, गिव मी ट्रीज ट्रस्ट और एचसीएल के समन्वित प्रयास से सोरखा गावं स्थित “हरित उपवन सोरखा” पर्यावरण, जल संवर्धन व जैव विविधता की अदभुत मिसाल के रूप में उभरा 


कटते पेड़ों और नए विकसित होते रिहायसी इलाकों के बीच मानवीय गतिविधियों नें पर्यावरण को काफी क्षति पहुचाई है | मानव जनसंख्या की जरूरतों को पूरा करनें के लिए पेड़ों का कटान और नए बिल्डिंगों के निर्माण का कार्य काफी तेजी से  होता रहा है | लेकिन इसी बीच सोहरखा गावं जो कि नॉएडा सेक्टर 115 के समीप स्थित है, एन सी आर में आनें के बाद इस इलाके में विद्यमान पेड़ों को काटकर नए भवन बनाये जानें (कंक्रीट के नए जंगल विकसित करनें) का कार्य काफी तेजी से बढ़ने लगा था | सब लोग अच्छे -अच्छे घर बनाकर एन सी आर में कार्य करने वाले लोगों को किराए पर चढाने में दिलचस्पी दिखा रहे थे | लेकिन इसी कड़ी में ऐसी बड़ी बन रही इमारतों में रहने वाले लोगों को ऑक्सीजन की पूर्ति के लिए नॉएडा प्रशासन नें एक बड़े ऑक्सीजन की पट्टी विकसित करनें की योजना तैयार की जिसमें एच सी एल (नामी व्यावसायिक समूह) नें आर्थिक मदद मुहैय्या करानें का संकल्प लिया और देश के नामी पर्यवरण कर्मी पीपल बाबा के नेतृत्व में इसे विकसित करनें का शिलशिला शुरू किया गया | 6 साल पहले वीरान पड़े क्षेत्र में आज 70,000 पेड़ों का एक विशाल शहरी वन स्थापित हो चूका है | जो अब जैव विविधता से धनी क्षेत्र के रूप में जाना जाता है | जहाँ आस पास में बसी घनी आबादी के लिए यह बन शुद्ध हवा के अच्छा स्रोत बना वहीँ एन सी आर के लोग यहाँ अपने छुट्टी के दिनों में पर्यावरण पिनिक पर आते हैं और पर्यावरण के बीच रहकर अपने समय को एन्जॉय करते हैं |


शुरुआत कैसे हुई गावं के लोगों नें इसके विकास में कैसे मदद की 

इस सन्दर्भ में उत्तर प्रदेश के गौतम बुध्द नगर जिले के तत्कालीन जिलाधिकारी बी एन सिंह नें बताया कि सोहरखा गावं न्यू ओखल इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी का हिस्सा था बाद में यह राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र  (एन सी आर) में आ गया | उन दिनों एन सी आर इलाके में देहात से भारी संख्या में  माइग्रेशन हुआ | इस समय जमीन पर काफी प्रेशर था | जहाँ 33 % भू-भाग पर वनस्पतियों के होने को स्वास्थ्यवर्धक बताया जाता है वहीँ इस इलाके में 2 % से भी कम भाग पर पेड़ पौधे हैं | लोगों के तेजी से माइग्रेशन के बाद जमीनों के दाम भी आसमान छू रहे थे लैंड माफिया भी धीरे धीरे जमीनों को अपनें कब्जे में भी ले रहे थे | इस बीच सबसे बड़ा चुनौती पूर्ण कार्य था Dense-Forestry के माध्यम से एक ऑक्सीजन के फैक्ट्री का विकास | इस महत्वपूर्ण कार्य में गावं के लोगों को साथ जोड़ा गया | एच सी एल की प्रोजेक्ट मेनेजर निधि से सम्पर्क करके इस प्रोजेक्ट के साथ जोड़ा गया और एक सीरियस प्लेयर को बुलाने का प्लान तैयार किया जो मियांवाकी पद्धति पर dense फारेस्ट बना सके | इस प्रकार स्वामी प्रेम परिवर्तन उर्फ़ पीपल बाबा की इस प्रोजेक्ट में एंट्री हुई | इस प्रकार जमीनों पर कब्जे, भीषण माइग्रेशन के दौर में सोशल फॉरेस्ट्री के तहत एक बड़े भू-भाग में घने जंगल के विकास की प्रक्रिया शुरू हुई | गावं के लोगों नें जम कर साथ दिया आज इस बड़े भू-भाग पर यह जंगल मजबूत फेफड़े के रूप में विकसित हो चुका है|


क्या है इस जगह की खासियत 

कभी वीरान रही इस जगह पर जंगल के विकसित होनें के बाद अब यहाँ  पर ढेर सारे कीट-पतंगों, पशु-पक्षियों का बसेरा है | ढेर सारे विदेशी पक्षी भी अब यहाँ पर आने लगे हैं | यहाँ पर विकसित हुई जैव विविधता सबका मन मोह लेती है | अब करीब 58 प्रकार के जीव इस शहरी वन की शोभा बढ़ा रहे हैं | कृत्रिम जल संरक्षण के स्रोत के विकास से  कैसे आत्मनिर्भर बना सोरखा  स्थित हरित उपवन सोरखा का जंगल अब पूरी तरह से आत्मनिर्भर बन चुका है | शहरी वनों के विकास के शुरूआती दौर में टैंकर से पानी की आपूर्ति की जाती है | लेकिन जब पेड़ बड़े होने लगते हैं तो टैंकरों का आना जाना काफी कठिन हो जाता है यहाँ यह बात दीगर है कि जंगलों में पौधों को काफी आसपास लगाया जाता है अतः पौधों के बढनें के बाद कम जगह की वजह जंगलों में पानी के टैंकरों का आवागमन कठिन हो जाता है अतः पौधों की सिंचाई के लिए कृत्रिम तालाबों पर निर्भरता काफी बढ़ जाती है | पीपल बाबा बताते हैं कि जहाँ कहीं भी वो कृत्रिम जंगल बनानें की शुरुआत करते हैं वहां पर सबसे ढलान वाली जगह पर तालाब का निर्माण भी करते हैं | हर वर्ष वरसात के  पानी के इक्कट्ठा होनें से 5 से 6 सालों बाद ये कृत्रिम  तालाब सालों साल पानी से भरे रहते हैं | इन तालाबों से आप जितना पानी  निकालेंगे जमीन से उतना पानी पुनः आ जायेगा | पीपल बाबा की टीम के अहम् सदस्य साहिद नें यह बात बताई कि कोरोना काल में जब पानी के टैंकर आने बंद हो गये तो जंगल के बीच स्थित इस कृत्रिम तालाब नें सोहरखा के जंगल के इन पेड़ों और आस-पास के जीवों की जान बचाई थी |


क्या है पर्यवरण पिकनिक कार्यक्रम 

यह पीपल बाबा के नेतृत्व में चलाए जा रहे हरियाली क्रांति अभियान का महत्वपूर्ण module है | इस module के अंतर्गत वे लोग कई बार स्कूलों के बच्चे जो पर्यावरण के साथ समय बिताते हैं और स्वेच्छा से पेड़ों की सेवा करते हैं | यहाँ पर लोग अमूमन पेड़ों की सेवा करने के लिए अपनी छुट्टीयों के दिन आते हैं और अपनी सेवा के बदले कोई पैसा नहीं लेते हैं इस प्रकार प्रोजेक्ट्स में लेबर चार्ज मिनिमम हो जाता है | ऐसे प्रोजेक्ट्स के विकास के लिए  जुडनें वाले ये स्वयंसेवक पीपल बाबा की टीम के अभिन्न अंग बन जाते हैं | अपने घरों की बालकनी में कम उचाई के पीपल नीम और बरगद के पौधे तैयार करते हैं जब ये पौधे 6 फीट ऊँचाई के हो जाते हैं तो उन्हें पौधारोपण केंद्र पर ले आते हैं इस प्रकार एन सी आर जैसी जगहों में जहाँ पेड़ लगाने के लिए जमीन नहीं है वहां के घर हरियाली से लबरेज होते हैं इसे हरियाली होम्स अभियान कहा जाता है | इस सन्दर्भ में दिलचस्प बात यह है कि  कोरोना काल में पीपल बाबा की टीम नें आवागमन के ठप्प होने पर स्वयंसेवकों से उनके घरों में नर्सरी को जीवित रखने के लिए पौधे  वितरित कर दिये  थे आपको बता दें कि इन्डियन नुर्सरी मैन एसोसिएशन आफ इण्डिया के मुताबिक लोकडाउन लगनें के बाद देश में  हजारो करोड़ की नुर्सरियां तबाह हो गई थीं | पीपल बाबा के एक स्वयसेवक नें बताया कि जब लॉक डाउन लगा लोग पार्कों में नहीं गए लेकिन अपने उपयोग का ऑक्सीजन घर में ही जुटानें में सफल रहे |

कुल मिलाकर इस क्षेत्र में प्रकृति नें अपना अनुपम रूप धारण कर लिया है | एच सी एल की मदद से सरकार (तत्कालीन जिलाधिकारी बी एन सिंह ) द्वारा दिए गए भू -भाग पर पीपल बाबा की टीम के द्वारा दशकों से की गई मेहनत से 18  एकड़ भूमि पर एक बड़े जंगल के निर्माण से क्षेत्र की अबो हवा काफी समृद्ध हो चुकी है इस प्रकार यह क्षेत्र देश के उत्तम  सी एस आर  प्रोजेक्ट के  सर्वोत्तम उदहारण के रूप में स्थापित हो गया है |

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